प्रभु शरन में अपनी जान बाबा मुझे भी तो लो पहचान
मुझ पर भी किरपा बरसाना , मेरी बिगडी बात बनाना।।
तेरा सुमिरन हनुमत बीरा।नासै रोग हरे सब पीरा ।।
कवन सो काज कठिन जग माही।जो नहीं होइ तात् तुम पाहीं।।
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि
तिनकर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारी।।
श्रवन सुजसु सुनि आयहुं प्रभु भंजन भवभीर।
त्राहि त्राहि आरती हरन् शरन सुखद् रघुबीर।।
शरणागत कहुं जे तजहिं निज अनहित अनुमानी।
ते नर पांमर पाप मय तिन्हहिं बिलोकति हानि।।
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